जयपुर संपादकीय

गुलाबी शहर का काला ज़मीनी खेल

संपादक की राय

साठ साल, तीन हज़ार करोड़: जयपुर की ज़मीन का ज़ख़्म

आज गुलाबी नगर के अखबारों में एक खबर दबी-दबी-सी आई है, लेकिन उसका ज़ख़्म साठ साल पुराना है और घाव तीन हज़ार करोड़ का। जयपुर में छह सौ एकड़ ज़मीन पर मालिकाना हक़ का विवाद, जो छह दशकों से कानूनी भूल-भुलैया में अटका है, एक बार फिर ‘री-सर्वे ड्राइव’ की आड़ में सिर उठा रहा है। क्या हम वाकई इतने अकर्मण्य हो चुके हैं कि तीन हज़ार करोड़ की सरकारी ज़मीन का फैसला करने में हमें एक पीढ़ी नहीं, दो पीढ़ियाँ लग जाएँ? या यह अकर्मण्यता नहीं, एक सोची-समझी चाल है?

छह सौ एकड़, तीन हज़ार करोड़! यह कोई गली-मोहल्ले का झगड़ा नहीं, न किसी छोटे किसान की झोपड़ी का मसला। यह इतनी बड़ी रकम है कि इससे पूरा शहर संवर सकता था, सड़कें बन सकती थीं, अस्पताल खुल सकते थे। लेकिन नहीं, यह पिछले साठ सालों से किसी दस्तावेज़ के धूल भरे पन्ने पर नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में और फाइलों के ढेर में जान-बूझकर ‘अनसुलझा’ रखा गया है। कौन हैं वो लोग जिन्हें इस अनसुलझी पहेली से फायदा हो रहा है?

ज़रा सोचिए, इतने सालों में कितनी सरकारें आईं और गईं, कितने मुख्यमंत्री बदले, कितने अफसरों ने कलम चलाई। हर किसी ने “पारदर्शिता” और “सुशासन” के दावे किए। क्या किसी की नज़र इस विशालकाय ज़मीन विवाद पर नहीं पड़ी? या फिर आँखें बंद कर ली गईं, क्योंकि बंद आँखों से ही कुछ ‘ख़ास’ सौदे होते हैं? यह सवाल सिर्फ़ ज़मीन का नहीं, हमारे पूरे तंत्र की नीयत पर है।

यह ‘री-सर्वे ड्राइव’ एक और ड्रामा है, एक और तारीख़ पर तारीख़ देने का बहाना। इससे पहले कितने सर्वे हुए होंगे, कितने कमिटी बैठी होंगी, कितनी रिपोर्टें धूल फाँक रही होंगी? क्या इस बार कोई जादुई मानचित्र सामने आएगा जो पिछली साठ साल की त्रुटियों को एक झटके में सुधार देगा? या फिर यह सिर्फ़ पुराने घाव पर नई पट्टी बाँधने जैसा है, जिसके नीचे सड़न बदस्तूर जारी रहेगी?

आम आदमी की ज़मीन पर अगर दो इंच भी अतिक्रमण हो जाए तो बुलडोज़र अगले दिन पहुँच जाता है। किसी गरीब का छोटा-सा घर रातोंरात ध्वस्त कर दिया जाता है। लेकिन जब बात हज़ारों करोड़ की ज़मीन की आती है, तो सरकारी मशीनरी इतनी सुस्त हो जाती है कि कछुआ भी शर्मा जाए। क्या यह दिखाता नहीं कि हमारे तंत्र की प्राथमिकताएँ क्या हैं और किसके लिए यह कितनी तत्परता से काम करता है?

इस पूरे प्रकरण में सबसे दर्दनाक बात यह है कि यह ‘गुलाबी शहर’ के दोहरे चरित्र को उजागर करता है। एक तरफ़ चमचमाती इमारतें, पर्यटन के दावे, और “स्मार्ट सिटी” की बातें; दूसरी तरफ़ ऐसी बुनियादी विसंगतियाँ जो दशकों से हमारी आत्मा को खोखला कर रही हैं। यह ज़मीन का विवाद सिर्फ़ कागज़ों का खेल नहीं, यह जयपुर के भविष्य पर एक अनसुलझा प्रश्नचिह्न है।

जब साठ साल तक तीन हज़ार करोड़ का मामला लटका रहे, तो फिर न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका — तीनों की जवाबदेही पर क्या सवाल नहीं उठने चाहिए? क्या यह संदेश नहीं जाता कि इस शहर में कानून और व्यवस्था सिर्फ़ कमज़ोरों के लिए है, और ताकतवरों के लिए ‘व्यवस्था’ खुद एक अदृश्य संरक्षक बन जाती है? जवाब किसी के पास नहीं है, क्योंकि जवाब देना होता तो यह विवाद साठ साल तक नहीं खिंचता।