जयपुर संपादकीय — 21 September 2026
कीड़ों की थाली: ‘नये राजस्थान’ का घिनौना स्वाद
संपादक की राय
आज जब हम गुलाबी नगर की चमकती सड़कों और सियासी बयानबाज़ी के शोर में डूबे हैं, तब उदयपुर के गांवों से आती ख़बर रूह कंपा देती है। बच्चों के निवाले में कीड़े मिले हैं, और यह कोई कहानी नहीं, बल्कि हमारे तथाकथित ‘नये राजस्थान’ की कड़वी हकीकत है। क्या कभी किसी नेता ने, किसी अफ़सर ने, अपने कलेजे के टुकड़े को ऐसी थाली परोसी होगी? यह सवाल सिर्फ़ पूछा नहीं जा रहा, यह हमें अंदर तक झकझोर रहा है।
जिन स्कूलों को ज्ञान का मंदिर कहा जाता है, जहाँ देश का भविष्य आकार लेता है, वहाँ खाना शौचालय के बगल में रखा जा रहा है। सड़ी हुई इमारतों में भविष्य की नींव डगमगा रही है, और सरकारी तंत्र कागज़ों पर विकास के महल बनाता चला जा रहा है। गांव वाले चंदा इकट्ठा कर के बच्चों का स्कूल चला रहे हैं, क्योंकि सरकार के पास शायद भव्य आयोजनों और चुनावी रैलियों से फ़ुरसत ही नहीं।
यह महज़ उदयपुर का मामला नहीं, यह उस पूरी व्यवस्था का सड़ांध है जो हमारी आंखों के सामने पनप रही है। जब बजट बनते हैं, तब शिक्षा के मद में करोड़ों का ज़िक्र होता है। जब योजनाएँ बनती हैं, तब ‘गुणवत्तापूर्ण शिक्षा’ और ‘स्वस्थ बचपन’ के नारे गूँजते हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत पर देखें तो इन नारों पर कीड़े रेंगते नज़र आते हैं। क्या यही है वह ‘सुशासन’ जिसकी कसमें खाई जाती हैं?
हमें बताया जाता है कि राजस्थान विकास की नई इबारत लिख रहा है, कि हम देश के गौरव हैं। लेकिन जब बच्चों के भोजन में कीड़े मिलें, जब उनकी शिक्षा की बुनियादी इमारतें भी ढहने लगें, तो यह गौरव किस मुंह से बखान किया जाए? यह कैसा विकास है जो सबसे कमज़ोर नींव पर खड़ा हो रहा है, जहाँ मासूमों की थाली तक सुरक्षित नहीं?
अफ़सरशाही की मोटी चमड़ी को क्या फर्क पड़ता है? उनके लिए यह महज़ एक ‘रिपोर्ट’ होगी, एक ‘जांच का विषय’ जिस पर कुछ दिन शोर होगा और फिर सब ठंडे बस्ते में। उन्हें क्या पता उन बच्चों की भूख का, उन माताओं के दर्द का जो अपने बच्चों को स्कूल भेजते समय भरोसा करती हैं कि वहाँ उन्हें पोषण मिलेगा, सुरक्षा मिलेगी, सम्मान मिलेगा।
यह घटना सिर्फ़ शर्मनाक नहीं, यह एक असहज आईना है। यह बताता है कि हमारे प्राथमिकताएँ कितनी खोखली हो चुकी हैं। जब सियासत सिर्फ़ चुनावी समीकरणों और बयानबाज़ियों में सिमट जाए, तब ज़मीन पर बच्चों के निवालों से लेकर पीने के पानी तक की बुनियादी ज़रूरतों का क्या होगा?
जब बच्चों के पेट में कीड़े पल रहे हों, तब कौन सा ‘लोक मंथन’ और कौन सी ‘सांस्कृतिक यात्रा’ हमारे समाज को एकता और गौरव की ओर ले जाएगी? क्या इस भयावह सच से आंखें मूंदकर हम सचमुच एक ‘विकसित’ समाज बन पाएंगे, या यह केवल एक भ्रम है जो गुलाबी पत्थरों के पीछे छिपकर पनप रहा है?