जयपुर संपादकीय — 22 September 2026
जलती ज़िंदगी, सिस्टम की राख
संपादक की राय
तेलंगाना के RIMS अस्पताल में दो नवजातों की मौत, यह सिर्फ एक खबर नहीं, यह उस हर दावे पर लगी कालिख है जो हमें ‘नया भारत’ होने का सपना दिखाता है। जब इन्क्यूबेटर की गर्मी जान बचाने के बजाय भस्म करने लगे, तो फिर सवाल सिर्फ शॉर्ट-सर्किट का नहीं रहता, सवाल उस पूरे तंत्र का है जो ज़िंदगी को दाँव पर लगाकर चैन की नींद सोता है। क्या सिर्फ कुछ घंटों के लिए माँओं की गोद सूनी हुई है, या हमारी सामूहिक चेतना ही हमेशा के लिए मर चुकी है?
खबर कहती है कि अट्ठाईस मासूमों को बचा लिया गया। बचा लिया गया, या बच गए? इस “बचाव” में कौन सी बहादुरी थी जब आग ही नहीं लगनी चाहिए थी? यह जश्न मनाने की बात नहीं, यह तो शर्म से सिर झुकाने का क्षण है कि हमारे अस्पतालों में, जहाँ जीवन की सबसे नाजुक शुरुआत होती है, वहाँ भी सुरक्षा के इतने बुनियादी इंतजाम नहीं कि एक चिंगारी दो परिवारों की दुनिया तबाह न कर दे। क्या यही हमारी स्वास्थ्य सेवाओं का नया मानदंड है – कि हर त्रासदी के बाद कुछ को बचाकर अपनी पीठ थपथपा ली जाए?
और फिर आता है वह रटा-रटाया संवाद: “जांच के आदेश दे दिए गए हैं।” क्या इन आदेशों से उन नवजातों की धड़कनें वापस आ जाएंगी? क्या कोई रिपोर्ट हमें बताएगी कि अस्पताल के हर कोने में आग बुझाने के उपकरण क्यों नहीं थे, तारों की जांच आखिरी बार कब हुई थी, और सबसे बढ़कर, उस लापरवाह अधिकारी का नाम क्या है जिसने इन बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाई थी? जांचें आती हैं, फाइलें बनती हैं, और धूल खाती हैं। यह एक तयशुदा नाटक है, जिसका अंत पहले से ही लिखा होता है।
इस गुलाबी शहर में, जहाँ हम आलीशान होटलों और भव्य सम्मेलनों की मेजबानी करते हैं, हम शायद भूल जाते हैं कि प्रदेश के सरकारी अस्पताल किस हाल में हैं। सिर्फ तेलंगाना क्यों, क्या हमारे अपने यहाँ के किसी भी अस्पताल में ऐसी घटना की आशंका नहीं है? जब हम बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स और ‘विश्व-स्तरीय’ सुविधाओं की बात करते हैं, तो क्या हमारी प्राथमिकता में वे छोटे-छोटे जीवन नहीं आते जो वेंटिलेटर और इन्क्यूबेटर के सहारे सांस लेते हैं? या उनकी मौतें सिर्फ एक छोटा सा आंकड़ा बनकर रह जाती हैं?
सच तो यह है कि इन दो मासूमों की मौत किसी एक अस्पताल या एक राज्य की नाकामी नहीं। यह उस समूचे तंत्र की असफलता है जो वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर नीतियां बनाता है, बजट आवंटित करता है, लेकिन जमीनी हकीकत से आँखें फेर लेता है। सुरक्षा ऑडिट के नाम पर खानापूर्ति, ठेकेदारों की मनमानी, और अधिकारियों की मिलीभगत—यह वह आग है जो अस्पतालों के इन्क्यूबेटर से कहीं ज्यादा खतरनाक है।
उन नवजातों के माता-पिता आज अस्पताल के कॉरिडोर में बैठे होंगे, उनकी आँखों में सिर्फ खालीपन होगा। उन्हें क्या फर्क पड़ता है कि जांच कौन करेगा, किसे सस्पेंड किया जाएगा, या कौन सा नया नियम बनेगा। उनकी दुनिया तबाह हो चुकी है। और हम, हम अगले सप्ताह किसी और खबर पर बहस करेंगे, किसी और घोटाले पर हल्ला मचाएंगे, और इस त्रासदी को भी वक्त की चादर तले दबा देंगे।
क्या हमारा समाज इतना संवेदनहीन हो चुका है कि हमें इन्क्यूबेटर में जलते बच्चों से भी ज्यादा चमकदार डोम और मसालों के सम्मेलनों की खबरें लुभाती हैं? जब तक हम इस पाखंड से बाहर नहीं आते, तब तक हर अस्पताल एक टाइम बम रहेगा, और हर नवजात शिशु की सांसें एक लॉटरी।
सवाल सिर्फ इतना है: अगली बार आग कहाँ लगेगी? और कितने मासूम उसके धुएँ में दम तोड़ेंगे, इससे पहले कि हमारी आँखें खुलें, या शायद, हम तय कर ही चुके हैं कि हमें देखना ही नहीं है।