जयपुर संपादकीय — 23 September 2026
समूचा जयपुर राख, एक नन्ही जान स्वाहा
संपादक की राय
जयपुर की गुलाबी शामों में जब एक पिता अपने धुएँ से भरे अस्पताल के गलियारे में पाँच दिन की बच्ची को बचाने के लिए टूट पड़ता है और उसे राख में सना हुआ पाता है, तो किस विकास की बात करें? यह सिर्फ़ एक बच्ची की मौत नहीं, यह इस शहर की उस आत्मा की मौत है जिसे हमने चमक-दमक के पीछे कहीं दफ़ना दिया है।
रिम्स अस्पताल के नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई में आग लगती है, धुआँ भर जाता है और पांच दिन की एक मासूम ज़िंदगी घुटन से दम तोड़ देती है। क्या ऐसे ही सुरक्षित होते हैं हमारे सरकारी अस्पताल, जहाँ नवजात को जीवन की पहली साँसें लेने की जगह मौत का अंतिम धुआँ मिलता है? हर आपदा के बाद ‘जांच कमेटी’ का शोर और फिर वही ‘सब ठीक है’ का दिलासा, यह कहानी अब पुरानी हो चली है।
अस्पतालों में अग्निशमन व्यवस्थाएँ कागज़ों पर इतनी चाक-चौबंद होती हैं कि उन्हें देखकर लगता है, आग क्या, कोई महामारी भी नहीं आ सकती। लेकिन जब असल में आग लगती है, तो पता चलता है कि ये व्यवस्थाएँ सिर्फ़ तस्वीरों और सरकारी ऑडिट की रिपोर्टों में ही ‘चालू’ रहती हैं। क्या ये तस्वीरें और रिपोर्टें उस पिता को जवाब देंगी, जिसने अपनी बच्ची को अपनी बाँहों में बचाने की कोशिश की थी?
सवाल सिर्फ़ अस्पताल प्रशासन पर नहीं, उन तमाम ‘विकास पुरुषों’ पर भी है जो ऐसी संस्थाओं का उद्घाटन करते समय ‘अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों’ की दुहाई देते नहीं थकते। क्या ये अंतर्राष्ट्रीय मापदंड सिर्फ़ फ़ीता काटने और तालियाँ बजवाने तक सीमित हैं, या इनमें मासूमों की जान बचाने की कोई नैतिक ज़िम्मेदारी भी शामिल है?
जयपुर, जो खुद को स्वास्थ्य सेवाओं का हब बनाने का सपना देखता है, वहाँ के एक प्रमुख अस्पताल में नवजात इकाई सुरक्षित नहीं। यह कैसी विडंबना है! एक ओर आलीशान होटल और पर्यटन के भव्य वादे, दूसरी ओर जीवन की सबसे नाज़ुक शुरुआत ही दम तोड़ रही है। यह कैसी दोहरी ज़िंदगी है, गुलाबी शहर की?
जब भी कोई हादसा होता है, बयानबाज़ी शुरू हो जाती है। मुआवजे का मरहम लगाया जाता है और फिर नई घटना का इंतज़ार होता है। क्या इस शहर में जीवन इतना सस्ता हो गया है कि उसकी क़ीमत कुछ लाख रुपयों में आँकी जा सके? क्या हम भूल जाते हैं कि हर आंकड़े के पीछे एक टूटता परिवार, एक अधूरा सपना और एक अनकही चीख़ होती है?
इस घटना के बाद भी क्या हम फिर से ‘सब कुछ ठीक है’ का मुखौटा पहन लेंगे? क्या फिर से जाँच कमेटियों की धूल में यह दर्द दब जाएगा? या इस बार कोई पूछेगा कि कब तक हमारी व्यवस्थाएँ सिर्फ़ ‘घटना’ घटने के बाद ही जागेंगी, और ‘दुर्घटना’ को नियति का खेल कहकर पल्ला झाड़ लेंगी?
क्या इस शहर की सड़कों पर चमकती गाड़ियाँ और भव्य इमारतों की चकाचौंध के पीछे, ऐसे ही मासूमों की साँसें घुटती रहेंगी? यह सवाल आज फिर हवा में है, और इस बार इसका जवाब सिर्फ़ अधिकारियों को नहीं, हम सबको देना होगा, जो इस शहर में रहते हैं।