जयपुर संपादकीय — 25 September 2026
कूड़े पर दर्शन की झाड़ू
संपादक की राय
आज जब गुलाबी नगर के चुनिंदा कोनों में झाड़ू थामे ‘अंतिम पायदान’ के उद्धारक घूम रहे थे, तो मन में सवाल उठा – क्या ‘अंत्योदय’ की परिभाषा अब इतनी सिकुड़ गई है कि वह सिर्फ़ कैमरे के सामने कूड़ा हटाने तक ही सिमट गई है?
दीनदयाल उपाध्याय के जिस दर्शन की दुहाई देकर आज स्वच्छता का पाठ पढ़ाया गया, वह तो समाज के सबसे निचले तबके तक सुख पहुँचाने की बात करता है। पर क्या उस ‘अंतिम’ व्यक्ति के जीवन में आज झाड़ू से ज़्यादा कुछ और नहीं बदला? क्या उसकी झुग्गी के बाहर का कीचड़, उसकी प्यास, उसके भूखे पेट की आहट, इन तस्वीरों में कहीं दिखी?
यह कैसा विडंबनापूर्ण दृश्य है, जहाँ एक तरफ़ ‘स्वच्छता सेवा अभियान’ का ढोल पीटा जा रहा है और दूसरी तरफ़ उसी मंच से राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर वार किए जा रहे हैं। क्या जयपुर की गलियों में फैले कचरे से ज़्यादा ज़रूरी प्रतिद्वंद्वी के शब्दों का कचरा साफ करना था? या यह सब बस एक बड़े ‘क्लीन-अप’ का हिस्सा है – छवि का, और विरोधियों की आवाज़ का?
हर कुछ महीने बाद नेताओं की ये झाड़ू उठाने वाली तस्वीरें सामने आती हैं। अल्बर्ट हॉल पर पौधे लगाए जाते हैं, स्वच्छता की शपथ ली जाती है। फिर क्या होता है? वही पुराने नगर निगम के कर्मचारी, वही ठेले वाले, वही सफाईकर्मी, जो बिना किसी कैमरे या भाषण के हमारी गंदगी ढोते हैं। क्या ये ‘अंत्योदय’ वाले नहीं हैं, जिनकी सुध लेने कोई नेता झाड़ू लेकर नहीं पहुँचता?
शहर की गुलाबी रंगत के पीछे छिपी बदरंग हकीकत क्या इन अभियानों से कभी बदलती है? क्या वे बस्तियाँ, जहाँ सीवर का पानी सड़कों पर बहता है, जहाँ कूड़े के पहाड़ महीनों से खड़े हैं, क्या वहाँ भी कभी ये वीआईपी झाड़ूएँ पहुँचती हैं? या वहां के लोगों को अपनी ‘अंत्योदय’ की लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है?
यह बस एक सालाना रस्म अदायगी लगती है, जहाँ दर्शन को कर्मकांड में बदल दिया जाता है। ‘स्वच्छता’ शब्द अब एक अवसर बन गया है – भाषण देने का, तस्वीरें खिंचवाने का, और अपने राजनीतिक एजेंडे को चमकाने का। असली गंदगी तो कहीं और है, जिसका निपटारा झाड़ू से नहीं, नीयत और ईमान से होगा।
अब जब कैमरा बंद हो चुका होगा और नेताओं की झाड़ूएँ वापस गाड़ी की डिग्गी में रख दी गई होंगी, तो जयपुर के कौन से कोने में वो ‘अंतिम’ व्यक्ति बैठकर सोच रहा होगा कि उसके हिस्से का ‘अंत्योदय’ कब आएगा? क्या उसके लिए भी कभी कोई नेता झाड़ू नहीं, बल्कि बदलाव का संकल्प लेकर आएगा? या उसे अपनी किस्मत के कूड़े के ढेर में ही जीवन खंगालते रहना होगा?