जयपुर संपादकीय

कागज़ी पुल, असली खाई

संपादक की राय

गुलाबी शहर की सड़कों पर जब कोई व्हीलचेयर पर बैठा व्यक्ति एक फुट ऊँचे फ़ुटपाथ पर अटकता है, तो उसके लिए कागज़ पर बने रैंप और हक़ीक़त में नदारद सुविधाओं का अंतर सिर्फ़ कागज़ी नहीं, शारीरिक और आत्मिक होता है। यह सिर्फ़ पत्थरों और सीमेंट की बात नहीं, यह हमारे दावों और हमारे सच के बीच की उस खाई की कहानी है, जिसे सरकारी दस्तावेज़ बड़ी बेरहमी से पाट देते हैं।

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के जयपुर कार्यालय ने सूचना के अधिकार के तहत एक सवाल के जवाब में बड़े गर्व से दावा किया कि उसने रैंप, पार्किंग और सुलभ शौचालयों जैसी व्यवस्थाएँ दुरुस्त कर रखी हैं। एक पल को लगा, वाह! हमारा गुलाबी नगर सचमुच संवेदनशील हो रहा है। पर यह ख़ुशी ज़्यादा देर नहीं टिकी, क्योंकि एक ज़मीनी पड़ताल ने इन दावों की परतें खोल दीं — और निकला सिर्फ़ झूठ, बेपरवाही और काग़ज़ी खानापूर्ति का बदरंग पुलिंदा।

यह अफ़सरशाही का वह चिर-परिचित अंदाज़ है, जहाँ फाइल में दर्ज आँकड़े ज़मीन पर मौजूद इंसानों की तकलीफ़ से कहीं ज़्यादा वज़नदार होते हैं। उनके लिए रैंप का मतलब शायद कागज़ पर खींची एक टेढ़ी रेखा है, और सुलभ शौचालय शायद किसी कोने में फेंका गया एक काल्पनिक नक्शा। गुलाबी शहर की इस दोगली ज़िदंगी में, दिखावा और हक़ीक़त हमेशा एक दूसरे से आंखें चुराते चलते हैं।

सूचना का अधिकार, जिसे नागरिकों के हाथों में पारदर्शिता का हथियार माना गया था, उसे अब सरकारी तंत्र ने अपने झूठ को वैधता प्रदान करने का एक और ज़रिया बना लिया है। सवाल पूछिए, जवाब मिलेगा—पर वह जवाब वही होगा, जो सत्ता की सुविधानुसार गढ़ा गया है। यह केवल अक्षमता नहीं, यह जानबूझकर जनता को गुमराह करने की एक सोची-समझी चाल है।

तो क्या हमारा “स्मार्ट सिटी” बनने का सपना भी कागज़ पर बने किसी भव्य महल जैसा है, जिसकी नींव में सिर्फ़ हवाई दावे और बेबुनियाद वादे हैं? क्या हम अपने दिव्यांग नागरिकों को यह कहने का साहस रखते हैं कि उनके लिए सुविधाएँ सिर्फ़ तब उपलब्ध होंगी, जब किसी अधिकारी की कलम चलेगी, न कि जब उन्हें सचमुच उनकी ज़रूरत होगी? यह उदासीनता जयपुर की पहचान बनती जा रही है।

ये केवल कुछ रैंप या कुछ शौचालय का मसला नहीं है। यह सरकारी तंत्र की उस प्रवृत्ति का परिचायक है जहाँ ‘काम करने’ से ज़्यादा ‘काम दिखावे’ पर ज़ोर होता है। जहाँ जनता के पैसों से कागज़ों पर आलीशान योजनाएँ बनती हैं, लेकिन ज़मीन पर सिर्फ़ टूटे वादे और उजड़ी उम्मीदें मिलती हैं।

कल को अगर कोई अधिकारी यह दावा कर दे कि जयपुर की सड़कों पर उड़ने वाली कारें चल रही हैं, और उनके पास इसकी ‘फाइल’ भी तैयार हो, तो क्या हैरत होगी? शायद नहीं। क्योंकि जिस व्यवस्था में ज़मीन की सच्चाई का कोई मोल न हो, वहाँ किसी भी बेतुके दावे को कागज़ी जामा पहनाया जा सकता है।

सवाल यह नहीं कि रैंप क्यों नहीं बने, सवाल यह है कि झूठ क्यों बोला गया? इस झूठ की जवाबदेही कौन लेगा? या हम सब इस गुलाबी शहर में ‘सब अच्छा है’ के भ्रम में जीते रहेंगे, जब तक किसी की व्हीलचेयर किसी बेतुके गड्ढे में अटक कर हमें फिर से हक़ीक़त का कड़वा स्वाद न चखा दे।