जयपुर संपादकीय

परिवार न्यायालय: न्याय का इंतज़ार या इंतज़ारगाह?

संपादक की राय

जयपुर के परिवार न्यायालय को आज भी अपने लिए एक अदद छत का इंतजार है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जहाँ रिश्तों के उलझे धागे सुलझाए जाते हैं, वहाँ खुद व्यवस्था अपने ही धागों में उलझी पड़ी है, और वह भी सिर्फ ईंट-गारे के मसले पर।

वकीलों का संगठन मुख्य न्यायाधीश से मिलता है, अपनी चिंताएँ गिनाता है। क्या सचमुच मुख्य न्यायाधीश को इस बात की खबर नहीं होगी कि न्याय के मंदिर की छत अभी तक कागजों में ही बन रही है? या फिर यह भी एक रस्म है, शिकायत की रस्म, जिसके बाद कुछ दिनों की चुप्पी और फिर वही ‘कार्य प्रगति पर है’ का बोर्ड?

सरकारी फाइलों का पेट इतना बड़ा होता है कि उसमें इमारतें क्या, पूरी की पूरी व्यवस्थाएँ समा जाती हैं। ‘फंड की कमी’, ‘जमीन का विवाद’, ‘टेंडर की अड़चन’ – ये ऐसे मंत्र हैं जिन्हें सुनकर हर विकास कार्य एक अनंत नींद में चला जाता है। और जब बात न्यायपालिका की हो, तो यह नींद और गहरी हो जाती है।

सोचिए, उन बेबस जोड़ों, बूढ़े माता-पिता या बच्चों का क्या, जिनकी किस्मत का फैसला इन अदालतों में होना है? वे अपने जीवन के सबसे निजी और संवेदनशील मुद्दों को लेकर आते हैं, और उन्हें मिलता है एक अस्थाई ठिकाना, शोरगुल और जगह की कमी। क्या यह न्याय की गरिमा के साथ समझौता नहीं?

गुलाबी नगर में नई-नई इमारतों के शिलान्यास और उद्घाटन की तस्वीरें आए दिन अखबारों की शोभा बढ़ाती हैं। पर्यटन और चमक-दमक के लिए सरकार के पास बजट और तत्परता की कोई कमी नहीं दिखती। लेकिन जहाँ नागरिक के बुनियादी हक, उसके न्याय की बात आती है, वहाँ खजाना खाली हो जाता है, और प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं।

यह जयपुर है, जहाँ पुरानी हवेलियों को संरक्षित करने के नाम पर करोड़ों बहाए जाते हैं, लेकिन न्याय के लिए एक नई, गरिमापूर्ण इमारत बनाने में दशकों लग जाते हैं। क्या हमारी प्राथमिकताएं सिर्फ बाहरी दिखावे तक ही सीमित रह गई हैं? क्या हम सिर्फ पत्थर और कलाकृतियों से ही प्यार करते हैं, न्याय के जीवित तंत्र से नहीं?

क्या न्याय को भीख की तरह मिलना चाहिए, जिसे अपनी जगह के लिए भी साल-दर-साल संघर्ष करना पड़े? क्या यह सिर्फ ईंट-गारे का मसला है, या न्यायपालिका के प्रति व्यवस्था की उदासीनता का प्रतीक?

जब न्याय के मंदिर की नींव ही इतनी कमज़ोर हो, तो उस पर खड़े होने वाले फैसलों की विश्वसनीयता पर कौन यकीन करेगा? यह सिर्फ एक इमारत का सवाल नहीं, यह उस भरोसे का सवाल है जो आम नागरिक व्यवस्था पर करता है। और वह भरोसा, फिलहाल, अधर में लटका है – ठीक उस नई इमारत के नक्शे की तरह, जो शायद कभी ज़मीन पर उतरेगा ही नहीं।