जयपुर संपादकीय

जयपुर की सड़क: लटकी ज़िन्दगियाँ

संपादक की राय

जयपुर की सड़कें अब सिर्फ़ मंज़िल तक पहुँचाने का रास्ता नहीं रहीं, बल्कि एक भयावह प्रदर्शनी बन गई हैं – जहाँ ज़िन्दगियाँ, अधमरी या बेजान, वाहनों से लटकी मिल रही हैं। कल रात, जब दो दोस्त एक ट्रक के आगे लटके, अपनी साँसों के लिए जूझ रहे थे, तो क्या उस वक्त गुलाबी नगर साँस ले रहा था, या अपनी बेरुख़ी पर मुस्कुरा रहा था?

यह सिर्फ़ एक हादसा नहीं, बल्कि उस क्रूरता का रोज़मर्रा का दृश्य है, जिसे हम ‘दुर्घटना’ कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। चार ज़िन्दगियाँ, एक बाइक, और फिर एक ट्रक। नतीजा? दो मौतें, दो ज़िंदगी और मौत के बीच झूलते युवा। और हमारा शहर? शायद अगली हेडलाइन का इंतज़ार कर रहा होगा, जब तक कोई और दर्दनाक फुटेज वायरल न हो जाए।

बातें होती हैं स्मार्ट सिटी की, विश्वस्तरीय पर्यटन की, नए कोचिंग हब की। लेकिन इस सुनहरी परत के नीचे, सड़कों पर हर दिन खून बहता है। चमचमाती इमारतें, लेकिन टूटी सड़कें; तेज़ रफ़्तार गाड़ियाँ, लेकिन लचर यातायात व्यवस्था। क्या यही है हमारा दोहरी ज़िंदगी जीने का सलीका, जहाँ एक तरफ हम आधुनिकता का ढोंग रचते हैं और दूसरी तरफ बुनियादी सुरक्षा से भी मुँह मोड़ लेते हैं?

पुलिस के आंकड़ों में ये महज़ संख्याएँ हैं, प्रशासन की फाइलों में निपटाई जाने वाली शिकायतें। कौन पूछता है उन ट्रक चालकों से, जिन्हें सड़क पर यमदूत बनने की खुली छूट मिली हुई है? कौन सवाल करता है उस परिवहन विभाग से, जो शायद फ़ाइन वसूलने में ज़्यादा मुस्तैद है, न कि जान बचाने में?

दो-चार दिन शोर मचेगा। शोक व्यक्त किया जाएगा। कुछ अधिकारी ट्रांसफर होंगे, कुछ बयानबाज़ियाँ होंगी। फिर सब शांत। शहर फिर अपनी रफ़्तार पकड़ेगा, उसी लापरवाही और उसी बर्बरता के साथ, जब तक कोई और बाइक, कोई और परिवार, किसी और ट्रक के पहियों तले न कुचल जाए। यह तो एक नियति बन गई है, जिसमें हम सब चुपचाप भागीदार हैं।

इस शहर में इंसान की जान इतनी सस्ती क्यों हो गई है? एक करोड़ की फिरौती के लिए धमकियाँ मिलती हैं, तो प्रशासन तुरंत हरकत में आता है, लेकिन दो मासूमों की जान सड़क पर कुचल दी जाती है और ये सामान्य घटना बन जाती है। हमारी सामूहिक चेतना को क्या हो गया है? क्या हम इतने पत्थरदिल हो गए हैं कि ये दृश्य अब हमें विचलित नहीं करते, बल्कि सिर्फ़ एक खबर बनकर रह जाते हैं?

जब सड़कों पर मौत का ये तांडव रोज़ का खेल बन जाए, और हम सिर्फ़ दर्शक बनकर रह जाएँ, तो क्या हमें खुद को ‘सभ्य’ कहने का हक है? या जयपुर सचमुच एक ऐसा शहर बन गया है, जहाँ ‘जीवन’ सिर्फ़ एक शब्द है, जिसकी कोई कीमत नहीं?