जयपुर संपादकीय — 29 September 2026
आरती या आक्रामकता?
संपादक की राय
आज सुबह जब हमने अख़बारों की सुर्खियाँ पलटीं, तो एक खबर ठिठका गई – जयपुर के एक मंदिर में पुजारी को “तेज़ आरती” के लिए पीटा गया, कपड़े फाड़ दिए गए। यह किसी चोर या लुटेरे का काम नहीं था, यह उस “भक्त” का काम था जो शायद अपनी ही श्रद्धा के शोर से असहज हो गया। गुलाबी नगरी, जहां कण-कण में आस्था बसती है, वहां अब भगवान के नाम पर भी शांति भंग होती है, और उसका खामियाजा पुजारी को अपनी देह पर भुगतना पड़ता है।
मंदिर, जो कभी मन की शांति का ठिकाना होता था, आज वहां भी हिंसा की दस्तक सुनाई देती है। यह कैसा नया जयपुर है, जहां आरती की ध्वनि भी कानफोड़ू लगने लगती है? क्या अब हम अपनी आत्मा की पुकार को भी डेसिबल मीटर से मापने लगे हैं, और अगर वह तय सीमा से ज़्यादा हो, तो लाठियां चलाने लगते हैं? यह सिर्फ़ एक पुजारी पर हमला नहीं, यह उस सामाजिक धैर्य पर वार है जो कभी हमारे सामूहिक जीवन का आधार था।
एक समय था, जब मंदिर की घंटियों की आवाज़, अज़ान की गूँज और भजन-कीर्तन की धुनें हमारे शहरों की पहचान थीं। वे हमें एक-दूसरे से जोड़ती थीं, भले ही आस्था अलग हो। आज वही ध्वनियाँ झगड़े का सबब बन रही हैं। यह कैसा विकास है, जिसमें हम बाहरी चमक-दमक तो बढ़ा रहे हैं, पर भीतर से इतने खोखले होते जा रहे हैं कि ज़रा सी ध्वनि भी हमें बर्दाश्त नहीं?
सवाल सिर्फ़ उस हमलावर पर नहीं, सवाल हम सब पर है। क्या हम इतने असहिष्णु हो गए हैं कि पड़ोसी की आस्था का स्वर भी हमें दुश्मन जैसा लगने लगा है? यह घटना दर्शाती है कि सहिष्णुता की हमारी विरासत अब कितनी पतली डोर से लटकी है। जयपुर, जो अपनी मेहमाननवाजी और संस्कृति के लिए जाना जाता है, अब ऐसी घटनाओं का गवाह बन रहा है।
प्रशासन और पुलिस भी शायद इंतज़ार कर रहे थे कि मामला अपने आप सुलझ जाए, या शायद ‘आध्यात्मिक’ मामला समझकर अनदेखा कर दिया। अगर मंदिर में भी पुजारी सुरक्षित नहीं, तो आम नागरिक की सुरक्षा का दावा कितना सच्चा है? इस एक घटना में हमारे शहरी जीवन की कई परतें उधड़ती दिख रही हैं: बढ़ता तनाव, घटता संयम और व्यवस्था की उदासीनता।
हम उस शहर में जी रहे हैं जहाँ ‘अतिथि देवो भव’ का पाठ पढ़ाया जाता है, और उसी शहर के मंदिर में देवता के सेवक को पीटा जाता है क्योंकि उसकी आरती “ज़्यादा तेज़” थी। शायद अब हमें अपने मंदिरों के बाहर ‘साउंड प्रूफ’ दीवारें खड़ी करनी होंगी, ताकि भक्ति की आवाज़ किसी को असहज न कर दे। या शायद, हमें अपनी आत्माओं को ‘मौन’ कर देना होगा, ताकि किसी को कोई शिकायत न हो।
सोचिए, अगला कौन होगा? कोई बाज़ारी शोर, कोई बच्चों का खेल, या किसी की हंसी भी अब हिंसा का न्योता बन सकती है। जब पूजा-पाठ भी एक आपराधिक कृत्य बन जाए, तो फिर किस बात की शांति और किस बात की आस्था? क्या हमने सचमुच इतने शोर में अपनी इंसानियत की आवाज़ खो दी है?